सुभाष मंडल की यह व्यथा कथा दरअसल चावल की हांडी के एक दाने की व्यथा कथा है। दरअसल यह भूमिहीन किसान गांवों के ही वो पढ़े लिखे बेरोजगार युवक हैं, जिन्होंने रोजगार के लिए अपने गांव को छोड़कर बड़े शहरों का रुख नहीं किया तथा गांव पर रहकर ही रोजगार के नए तरीके तलाशने की कोशिश की और, जिन्होंने बड़े किसानों कि खेतों पर मजदूरी करने के बजाय उन किसानों की खाली बंजर पड़ी जमीनों को लीज अथवा मौखिक किराए पर लेकर उस पर अपनी कड़ी मेहनत और पसीने के दम पर अल्पकालीन साग सब्जी की फसलें उगा कर स्वरोजगार का एक नया तरीका ,एक नई राह दिखाई है।
कोंडागांव जगदलपुर तथा आसपास के जिलों में सुभाष बंडल जैसे हजारों प्रगतिशील युवा किसान है जो या तो बैंक से अल्पकालीन कर्ज लेकर अथवा ज्यादातर आसपास के मित्र रिश्तेदारों साहूकारों से कर्ज लेकर मिर्ची, साग सब्जी, अदरक, हल्दी, औषधीय,सुगंधी फसलों तथा अन्य नकदी फसलों की खेती करते हैं , एक और जहां वह आसपास के इलाकों, बड़े शहरों तथा अन्य प्रदेशों तक की साग सब्जी की जरूरतों को पूरा करते हैं, वहीं दूसरी ओर वह गांव के बेरोजगारों को अपने खेतों पर रोजगार भी देते हैं लेकिन अफसोस कि लॉक डाउन ने इस कच्चे धंधे को जड़ से उखाड़ दिया है। जरूरत है कि सरकार सुभाष मंडल जैसे किसानों को भी राहत पहुंचाने की बारे में भी सोचे,, जिनके पास ना तो खेती का पट्टा है , ना वो पंजीकृत किसान हैं , और ना ही कृषि अथवा उद्यानिकी विभाग में उनका कोई रिकॉर्ड है ,उनके लिए ना कोई अनुदान की योजना है, ना कोई बीमा योजना है,, बेशक वह अंचल के सबसे बड़े मिर्ची उत्पादक किसानों में से एक हैं।