चार मंजिला अखंड ज्योति,दो दशक और संगम तट,देवरहा बाबा के शिष्य के पंडाल की अनोखी कहानी


चार मंजिला अखंड ज्योति,दो दशक और संगम तट,देवरहा बाबा के शिष्य के पंडाल की अनोखी कहानी

धनंजय सिंह | 09 Jan 2026

 

प्रयागराज।त्रिवेणी संगम पर हर साल माघ मेले में आस्था का सैलाब उमड़ता है।माघ मेला तप,त्याग और परंपराओं का अनोखा जीवंत उत्सव है।साधु-संतों की साधना,कल्पवासियों की दिनचर्या और असंख्य पंडाल ये सब मिलकर एक अनोखा संसार रचते हैं।यहां एक ऐसा पंडाल है,जो अस्थायी ढांचों के बीच स्थायित्व, साधना और आस्था की मिसाल बनकर खड़ा है।यह पंडाल झूसी पुल के नीचे है,जिसे देवरहा बाबा के शिष्य महंत रामदास संचालित करते हैं।

माघ मेला और महाकुंभ के दौरान ज्यादातर पंडाल हर साल लगते और उखड़ जाते हैं,वहीं यह पंडाल साल भर खड़ा रहता है।बारिश के महीनों में जब संगम क्षेत्र का बड़ा हिस्सा बाढ़ के पानी से घिर जाता है, तब भी यह पंडाल तपस्वी की तरह अडिग रहता है।मानो आस्था ने इसे जमीन में नहीं, विश्वास में रोप दिया हो।

पंडाल की सबसे बड़ी पहचान है इसकी 20 फीट ऊंची कुटिया।इस कुटिया में देवरहा बाबा और भगवान का छोटा-सा मंदिर स्थापित है।यहीं महंत रामदास प्रतिदिन पूजा-पाठ करते हैं।सादगी और साधना का यह संगम श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है।कुटिया के भीतर न कोई सजावट है, न दिखावा बस मौन, मंत्र और ध्यान की शांति,लेकिन जो चीज इस पंडाल को सचमुच तिलिस्मी बनाती है,वह है कुटिया के ठीक बगल में जलती हुई चार मंजिला इमारत जितनी ऊंची अखंड ज्योति। यह ज्योति बीते 20 वर्षों से लगातार जल रही है,न इसे छुआ जाता है,न इसकी पूजा की जाती है।यही कारण है कि इसकी संरचना और डिजाइन भी अलग है, ताकि लौ निर्बाध जलती रहे,यह ज्योति देश की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना के लिए जलाई गई थी और तब से आज तक बिना रुके जल रही है।

माघ मेले में आने वाले श्रद्धालु जब इस अखंड ज्योति को देखते हैं, तो आस्था से भर जाते हैं।चार मंजिल की ऊंचाई पर लौ दिन-रात जलती है,श्रद्धालुओं के मन में श्रद्धा के साथ जिज्ञासा भी जगाती है।कोई पूछता है इतने सालों से कैसे जल रही है,कोई इसे तपस्या का चमत्कार मानता है, तो कोई इसे परंपरा की शक्ति।

महंत रामदास बताते हैं कि यह पंडाल साधना का प्रतीक है। देवरहा बाबा की परंपरा में दिखावे से दूर रहकर तप और सेवा को प्राथमिकता दी जाती है।यहां आने वाले श्रद्धालु शांति महसूस करते हैं,पंडाल में निरंतर भंडारा भी चलता रहता है, जहां सभी को समानता के भाव के साथ भोजन कराया जाता है।यह सेवा भाव ही इस स्थान की आत्मा है।

बता दें कि झूसी क्षेत्र के अन्य पंडालों के बीच रामदास का यह पंडाल अनूठा है,जहां अन्य कहीं शोर-शराबा और भीड़ होती है, तो यहां एक अलग ठहराव है,लोग कुछ पल बैठते हैं, अखंड ज्योति को देखते हैं और भीतर उतरते हुए लौटते हैं। माघ मेला अस्थायी शहर की तरह बसता और बिखरता है, लेकिन रामदास का पंडाल उस शहर की स्थायी आत्मा जैसा है।बाढ़,मौसम और वक्त तीनों की परीक्षा में यह पंडाल खरा उतरता है।चार मंजिला अखंड ज्योति की लौ,दो दशक की निरंतरता और देवरहा बाबा की परंपरा ये तीनों मिलकर इस पंडाल को एक कहानी बना देते हैं। एक ऐसी कहानी,जो हर साल माघ मेले में नए श्रद्धालुओं को बुलाती है और पुराने विश्वास को और गहरा कर देती है।


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