पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में खुद दी दलील,जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को शराब नीति मामले से की हटाने की मांग,पेश किए 10 आधार


पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में खुद दी दलील,जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को शराब नीति मामले से की हटाने की मांग,पेश किए 10 आधार

मनोज बिसारिया | 13 Apr 2026

 

नई दिल्ली।सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने कथित शराब घोटाले में आरोप मुक्त किए गए पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत अन्य की उस याचिका पर सुनवाई की।
अरविंद केजरीवाल ने कथित शराब घोटाले के मामले में जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को सुनवाई से हटाने (रिक्यूजल) की अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा कि वे जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा और सम्पूर्ण न्यायपालिका का बहुत सम्मान करते हैं। केजरीवाल ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से सहयोग की अपेक्षा जताते हुए कहा कि दोनों पक्ष केवल रिक्यूजल अर्जी पर ही ध्यान केंद्रित करेंगे।केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि वे आज आरोपित की हैसियत से नहीं, बल्कि दोषमुक्त व्यक्ति की हैसियत से कोर्ट में खड़े हैं। 

पहली सुनवाई में दिल बैठ गया,पक्षपात का संदेह हुआ

अरविंद केजरीवाल ने बताया कि 9 मार्च को इस कोर्ट में पहली सुनवाई हुई थी।उस समय केवल सीबीआई पक्ष मौजूद था और मात्र 5 मिनट की सुनवाई में ट्रायल कोर्ट के आदेश को प्रथम दृष्टया गलत करार दे दिया गया। केजरीवाल ने कहा, जब यह आदेश आया तो मेरा दिल बैठ गया। मुझे संदेह होने लगा कि क्या अदालत पक्षपाती है और क्या मुझे यहां न्याय मिल पाएगा।इसी कारण उन्होंने मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर मामले को किसी अन्य पीठ को स्थानांतरित करने का अनुरोध किया और फिर रिक्यूजल अर्जी दाखिल की।

पक्षपात न भी हो,लेकिन उचित संदेह काफी है

अरविंद केजरीवाल ने तर्क दिया कि जज का वास्तविक पक्षपात होना जरूरी नहीं है।यदि संबंधित पक्षकार के मन में उचित और गंभीर संदेह है, तो न्यायमूर्ति को सुनवाई से अलग होना चाहिए। केजरीवाल ने कहा,मेरे मन में आशंका है और मेरी यह छोटी-सी आपत्ति अदालत व पक्षकार के बीच का मामला है। इसमें सीबीआई का कोई अधिकार नहीं है और इसे पक्षकार नहीं बनाया जाना चाहिए।

सत्येंद्र जैन मामले का हवाला,ईडी को समानता क्यों नहीं

पूर्व मंत्री सत्येंद्र जैन के मामले का उदाहरण देते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा कि उस मामले में 6 दिन तक 18 घंटे की सुनवाई हो चुकी थी,तब तक ईडी को कोई आशंका नहीं हुई। आखिरी तारीख पर अचानक आशंका जताई गई और मामला स्थानांतरित कर दिया गया। केजरीवाल ने कहा कि मेरे मामले में भी दोनों स्थितियां समान हैं। प्रश्न जज की निष्ठा का नहीं, बल्कि पक्षकार के मन में व्याप्त आशंका का है। उस मामले में इस अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा किया था। मैं केवल ईडी के बराबर समानता की मांग कर रहा हूं, खासकर जब मेरी आशंकाओं का आधार कहीं ज्यादा मजबूत है।

पक्षकार के मन में वास्तविक आशंका ही काफी

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि कानून बहुत सीधा है। क्या मेरे मन में कोई वास्तविक,गंभीर और उचित आशंका है कि इस याचिका पर निष्पक्ष सुनवाई नहीं होगी,उन्होंने इस पर 10 आधार पेश करने की बात कही। केजरीवाल ने कनक लता मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि जज की पहले की गई कड़ी टिप्पणियां भी उचित आशंका पैदा कर सकती हैं।

कोर्ट की टिप्पणियां निर्णय जैसी थीं, सिर्फ दो सुनवाइयों में निष्कर्ष

अरविंद केजरीवाल ने बताया कि इस कोर्ट के सामने उनके 5 मामले आए,जिनमें से ज्यादातर जमानत से संबंधित थे। उनका मुख्य मामला अवैध गिरफ्तारी से जुड़ा था। कोर्ट को केवल यह देखना था कि जांच अधिकारी के पास गिरफ्तारी के लिए उचित कारण थे या नहीं। इसके बावजूद कोर्ट ने मात्र दो सुनवाइयों में ही मजबूत और अंतिम निर्णय जैसी टिप्पणियां कर दीं।

कोई बरामदगी नहीं,फिर भी गिरफ्तारी को सही ठहराया

अरविंद केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के उस फैसले का जिक्र किया,जिसमें उनकी गिरफ्तारी को वैध माना गया। केजरीवाल ने कहा कि ईडी और सीबीआई ने कई छापेमारी कीं,लेकिन कोई बरामदगी नहीं हुई।इसके बावजूद अदालत ने मजबूत फैसला सुनाया। केजरीवाल ने आरोप लगाया कि सरकारी गवाहों से डील कर उन्हें नाम लेने के लिए मजबूर किया जाता है और फिर उन्हें भ्रष्टाचार का दोषी ठहरा दिया जाता है।

ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले का हवाला

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिल्कुल विपरीत निष्कर्ष निकाले हैं। ट्रायल कोर्ट के अनुसारकोई अपराध नहीं हुआ,कोई रिश्वत नहीं ली गई,कोई अपराध की आय नहीं बनी।गोवा में पैसा ले जाने का मामला नहीं।ट्रायल कोर्ट ने सरकारी गवाहों के बयानों को पूरी तरह अविश्वसनीय करार दिया और सीबीआई के रवैये को सोची-समझी कहानी बताया।

मनीष सिसोदिया मामले की समानता 

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि मनीष सिसोदिया के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में भी लगभग यही स्थिति थी और फैसला पहले ही सुनाया जा चुका था।

कोर्ट ने पूछा,यह सवाल आप मुझे नहीं कर सकते

इस पर न्यायपीठ ने साफ कहा कि केजरीवाल यह सवाल अदालत से नहीं कर सकते कि कोर्ट ने आदेश कैसे लिखा या क्यों लिखा।कोर्ट ने कहा,ये आप मुझे नहीं बताएं कि मैंने आदेश कैसे लिखा। अगर आप चाहें तो यह सुप्रीम कोर्ट को बता सकते हैं।

ईडी का कोई लेना-देना नहीं, फिर भी मौखिक मांग पर रोक

अरविंद केजरीवाल ने तर्क दिया कि 9 मार्च के आदेश में ईडी के तहत ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगा दी गई थी। यह एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका थी,जिसमें ईडी का कोई संबंध नहीं था। केजरीवाल ने कहा कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केवल मौखिक मांग की थी और उनकी उसी मौखिक प्रार्थना पर बिना किसी की सुनवाई किए आदेश पास कर दिया गया।

ट्रायल कोर्ट की टिप्पणी IO के खिलाफ थी, फिर भी IO को राहत क्यों

अरविंद केजरीवाल ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां सीबीआई के बजाय जांच अधिकारी (IO) के खिलाफ थीं। IO ने खुद कोई राहत नहीं मांगी थी और वह अदालत के सामने भी नहीं थे।सीबीआई के कहने पर IO की कार्यवाही पर रोक लगाना गहरी शंका पैदा करता है, क्योंकि IO खुद कुछ मांग ही नहीं रहा था।

 भाषा और स्पीड से लगा राजनीतिक भेदभाव

अरविंद केजरीवाल ने कोर्ट द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पर भी सवाल उठाया। केजरीवाल ने कहा कि इस कोर्ट के पास MP-MLA का रोस्टर जनवरी में आया था। उसके बाद उन्होंने रिवीजन पिटीशन का विश्लेषण किया।

 ये मामले हमारे सबसे बड़े राजनीतिक विरोधियों के

पीठ का सवाल और केजरीवाल का जवाब इस पर पीठ ने पूछा,तो आप राजनीतिक भेदभाव का इशारा कर रहे हैं,केजरीवाल ने जवाब दिया कि एक मामले में सुनवाई के लिए तीन महीने का समय दिया गया,दूसरे मामले में छह महीने का समय मिला,जबकि उनके मामले में जवाब दाखिल करने का अधिकार ही बंद कर दिया गया।

जज पर लगाया आरएसएस से जुड़े होने का आरोप

सुनवाई से अलग होने का एक और कारण बताते हुए अरविंद केजरीवाल ने कहा कि यह अदालत ईडी और सीबीआई की हर बात का समर्थन कर रही है। केजरीवाल ने कहा कि आरएसएस की एक इकाई है अधिवक्ता परिषद्।इसके कार्यक्रम में न्यायमूर्ति स्वयं चार बार गई हैं। केजरीवाल ने यह भी कहा कि आरएसएस की विचारधारा के हम सख्त खिलाफ हैं और ये केस राजनीतिक केस है। यदि आप किसी विशेष विचारधारा के कार्यक्रम में भाग ले रही हैं, तो उचित पूर्वाग्रह पैदा होता है। धारणा है कि क्योंकि मैं विपरीत विचारधारा का हूं, तो मुझे न्याय मिलेगा या नहीं।

कोर्ट ने संदेह होने का कारण पूछा

इस पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल से पूछा जब मैं उस प्रोग्राम में गई थी तो क्या मैंने कोई राजनीतिक बयान दिया था या वैचारिक बयान दिया था या फिर वह कोई लीगल प्रोग्राम था। जस्टिस शर्मा ने कहा कि सिर्फ इस बात से कि मैं गई थी और प्रोग्राम में शामिल हुआ थी, इससे शक पैदा होता है। जवाब में केजरीवाल ने कहा कि अभी गृहमंत्री ने बयान दिया कि हाई कोर्ट जो भी आदेश देगा उसके खिलाफ मैं सुपीम कोर्ट में अपील करूंगा।जवाब में अदालत ने कहा कि वह या आप जो कहते हैं, उस पर मेरा क्या कंट्रोल है, इसी के साथ केजरीवाल ने अपनी जिरह पूरी की।

 न्यायिक मन बहुत ज्यादा आश्वस्त

पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगडे ने कहा कि अदालत को इस मामले की पूरी जानकारी है।कहा कि मेरे मुवक्किल इसे किसी आरोप के तौर पर नहीं कह रहे हैं, बल्कि कभी-कभी जब न्यायिक मन किसी बात को लेकर सबसे ज्यादा आश्वस्त होता है, तो वही वह क्षण होता है जब न्यायिक मन को एक कदम पीछे हट जाना चाहिए।हेगड़े ने कहा कि सिसोदिया को इस मामले का गब्बर सिंह बना देने के बाद, इस बात की बहुत ज्यादा संभावना है कि गब्बर सिंह को बरी करने वाले आदेश पर शायद निष्पक्ष सुनवाई न हो पाए। यहां मुख्य मुद्दा फैसले में किसी पूर्वाग्रह का नहीं है, बल्कि मुकदमा लड़ने वाले के मन में मौजूद आशंका का है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि ट्रायल कोर्ट ने अपने विस्तृत आदेश में, इन सभी तथ्यों पर इस अदालत की बात का खंडन किया है।


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