दिल्ली उच्च न्यायालय का अहम फैसला,10 महीने से कोमा में पड़े सैनिक के स्पर्म सुरक्षित रखने के लिए दी मंजूरी


दिल्ली उच्च न्यायालय का अहम फैसला,10 महीने से कोमा में पड़े सैनिक के स्पर्म सुरक्षित रखने के लिए दी मंजूरी

मनोज बिसारिया | 16 Apr 2026

 

नई दिल्ली।लंबे समय से कोमा जैसी हालत में पड़े भारतीय सेना के एक जवान के स्पर्म निकालने और उसे सुरक्षित करने की दिल्ली उच्च न्यायालय ने अनुमति दे दी है।न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जवान ने अपनी पत्नी के साथ आईवीएफ इलाज करवाने के लिए पहले ही सहमति दे दी थी,जिसे असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलाॅजी (रेगुलेशन)एक्ट-2021 के तहत एक वैध सहमति माना जाएगा।

श्रीमद् भागवत का हवाला देते हुए पीठ ने दिया निर्देश...

श्रीमद् भागवत का हवाला देते हुए पीठ ने निर्देश दिया कि पत्नी को सिर्फ इस आधार पर इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता कि पति की लिखित सहमति मौजूद नहीं थी।

कोर्ट ने सैनिक की पत्नी की अर्जी पर दिया फैसला

अदालत ने कहा कि यह प्रक्रिया,हालांकि अन्य कानूनी जरूरतों और पति की मेडिकल स्थिति पर भी निर्भर करेगी। अदालत ने उक्त आदेश जवान की पत्नी की अर्जी पर दिया,जिसमें महिला ने पति का स्पर्म निकालने और उसे सुरक्षित रखने की अनुमति देने की मांग की थी,ताकि वह आईवीएफ इलाज करवा सके।

महिला के पति को जम्मू-कश्मीर में तैनाती के दौरान सिर में लगी थी गंभीर चोट...

महिला के पति को जुलाई-2025 में जम्मू-कश्मीर में तैनाती के दौरान सिर में गंभीर चोट लगी थी और तब से वह लगातार कोमा में हैं।इस घटना से पहले दोनों ने आईवीएफ इलाज करवाने का फैसला कर लिया था और इसके लिए जरूरी प्रक्रियाएं भी शुरू कर दी थीं। हालांकि यह प्रक्रिया बीच में ही रुक गई,क्योंकि पति एआरटी एक्ट की धारा-22 के तहत नई लिखित सहमति देने की स्थिति में नहीं थे।

डॉक्टरों का कहना- जीवित स्पर्म मिलने की संभावना कम

सेना द्वारा गठित एक मेडिकल बोर्ड ने अपनी राय देते हुए कहा कि स्पर्म निकालना तकनीकी रूप से तो संभव है,लेकिन उससे जीवित स्पर्म मिलने की संभावना बहुत ही कम है।
याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने अपने फैसले में कहा कि महिला व उसके पति ने अपनी मर्जी से आईवीएफ इलाज और उससे जुड़ी प्रक्रियाओं को अपनाने का फैसला किया था और यह बात भी स्वीकार की गई है कि उन्होंने इस इलाज को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी कदम भी उठाए थे।

अदालत ने ये दिया निर्देश

अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की सहमति को उसके पति की ओर से दी गई वैध सहमति माना जाए। अदालत ने कहा कि प्रतिवादी अधिकारी केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता को इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकते कि याचिकाकर्ता के पति की लिखित सहमति उपलब्ध नहीं है।


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