नई दिल्ली।केंद्र सरकार आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी पालीलैक्टिक एसिड (पीएलए)उत्पादन को तो बढ़ावा दे ही रही है।सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाकर निजी क्षेत्र के सहयोग से इसके लिए एक बड़ा बाजार भी तैयार कर रही है।राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और एनसीआर सहित देश भर को परंपरागत प्लास्टिक से मुक्ति दिलाने के निमित्त अब पीएलए से निर्मित माइक्रोप्लास्टिक को बढ़ावा दिया जाएगा।
केंद्रीय पेट्रोकेमिकल इंजीनियरिंग एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआइपीईटी) द्वारा किए गए नवीनतम अध्ययन में सामने आया है कि पीएलए से बना माइक्रोप्लास्टिक परंपरागत प्लास्टिक की तुलना में मिट्टी में आसानी से विघटित हो जाता है।अध्ययन के मुताबिक 180 दिनों के अंदर पीएलए माइक्रोप्लास्टिक में प्रति किग्रा से 287 कण घटकर 18 कण प्रति किलोग्राम रह गए,जबकि परंपरागत प्लास्टिक छह माह बाद भी मिट्टी में ज्यों का त्यों बना रहता है। साथ ही मिट्टी की उर्वरता एवं जल स्रोतों को भी दूषित करता है।
सीआइपीईटी के पूर्व महानिदेशक एसके नायक ने कहा कि पीएलए सूरज की रोशनी और मिट्टी की स्थितियों में तेज़ी से विघटित होता है और बाद में पूरी तरह से इसका जैविक विघटन हो जाता है।मतलब पीएलए परंपरागत प्लास्टिक का वैज्ञानिक रूप से सस्टेनेबल विकल्प है।एसके नायक ने कहा कि हालांकि मकई और गन्ने के अवशेषों से तैयार हाेने वाला पीएलए माइक्रोप्लास्टिक 100 साल से भी अधिक पुराना है,लेकिन महंगा एवं कम टिकाऊ होने के कारण बड़े स्तर पर उत्पादन के लिए अनुपयुक्त माना जाता था।अब पर्यावरण जागरूकता बढ़ने और टेक्नोलाजी के बेहतर होने से पीएलए की स्थिति भी बदल रही है।पहले परंपरागत प्लास्टिक से तीन गुना तक महंगा रहा पीएलए डेढ़ गुना पर आ
गया है। आने वाले समय में यह परंपरागत प्लास्टिक की प्रतिस्पर्धी कीमतों पर आ जाएगा।
एसके नायक ने कहा कि इसी के मददेनजर बलरामपुरा चीनी मिल्स लिमिटेड (बीसीएमएल) उत्तर प्रदेश के कुंभी क्षेत्र में देश का सबसे बड़ा पीएलए प्लांट तैयार कर रहा है,जहां पीएलए माइक्रोप्लास्टिक से घरेलू उपयोगी उत्पाद बनाए जाएंगे।इस प्लांट की आधारशिला उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रखी थी,जबकि इस साल के अंत तक इस प्लांट का उदघाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों हो सकता है।
बीसीएमएल की कार्यकारी निदेशक अवंतिका सराओगी का कहना है कि ऐसे दौर में जबकि भारत पर्यावरणीय स्थिरता की दिशा में अग्रसर है,बायोडिग्रेडेबल उत्पादों का महत्व और बढ़ जाता है। हमारा भविष्य सिर्फ़ प्लास्टिक अपशिष्ट कम करने में नहीं,बल्कि ऐसे उत्पाद बनाने पर भी केंद्रित होना चाहिए,जो प्राकृतिक रीसाइक्लिंग में कारगर हों।यही समस्या का व्यावहारिक समाधान है।
बता दें कि ओडिशा,उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में बायोरिफाइनरी और पीएलए प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं,ताकि आयात शुल्क और लाजिस्टिक खर्च कम हो सके।
बायो रिफाइनरी के जरिए कृषि अवशेषों को सीधे पीएलए में बदलने की तकनीक पर शोध बढ़ाया गया है।केमिकल रीसाइक्लिंग के जरिये पुराने पीएलए को वापस उसके मूल अवयवों में बदलकर नया प्लास्टिक बनाना, कच्चे माल की जरूरत और लागत दोनों को कम कर रहा है।प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन (संशोधन) नियम 2026 के नए नियम भी बायोडिग्रेडेबल प्लास्टिक के उपयोग को बढ़ावा देते हैं।