लखनऊ।कभी राजधानी एक्सप्रेस दौड़ाई,कभी सुपरफास्ट ट्रेनें दौड़ाई। 35 साल में करोड़ों यात्रियों को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाया।यात्रियों को प्लेटफार्म पर मेरा बेसब्री से इंतजार करता देख चेहरा खिल उठता तो कभी कोरोना काल में थमे पहिए की कड़वी याद से मायूस भी।यात्रियोें के साथ मेरा सफर भी साथ-साथ चला,लेकिन अब मैं पटरियों पर नहीं नजर आऊंगा,मेरा सफर पूरा हो गया है।
रेलवे ने मुझे निष्प्रयोज्य घोषित करते हुए सेवानिवृत्त कर दिया है।मेरा फिलहाल ठिकाना अपने आठ और साथियों के साथ लखनऊ स्टेशन का यार्ड बन गया है।बस इंतजार उस दिन का है जब ई-आक्शन में कोई कंपनी मेरी बोली लगाकर खरीदेगा और फिर मेरे हिस्से को काटकर अलग-अलग बाजार में बेच देगा।अलविदा यात्रियों।अतीत में याद रखना।करीब 35 साल तक पटरियों पर दौड़ने वाले यह उन डीजल इंजनों की लाइन है,जो अब अतीत बनने जा रहे हैं।
लखनऊ के चारबाग स्टेशन से गुजरते समय यात्रियों की नजर बरबस ही एक लाइन से खड़े इन इंजनों पर पड़ रही है।एक दूसरे को जोड़कर खड़े इंजनों को जल्द ही अलग-अलग कर दिया जाएगा।डीजल इंजन की अधिकतम उम्र लगभग 35 साल होती है,लेकिन अच्छे मेंटनेंस के साथ यह 40 से 45 साल तक काम कर सकता है।
इंजन की उम्र उनके रखरखाव की गुणवत्ता,ओवरहालिंग की समयबद्धता,स्पेयर पार्ट्स की उपलब्धता,संचालन की परिस्थितियां और तकनीकी उन्नयन पर निर्भर करती है।एक इंजन प्रति वर्ष 80 हजार से 1.80 लाख किलोमीटर तक दौड़ता है।अपनी 35 से 40 वर्ष की सेवा के दौरान एक इंजन 70 लाख से 1.5 करोड़ किलोमीटर तक के चक्कर काटता है।
डीजल इंजन के फ्यूल टैंक में लगभग पांच हजार से छह हजार लीटर डीजल आता है।खड़े रहने की स्थिति में एक इंजन 15 से 25 लीटर प्रति घंटा डीजल की खपत करता है। कम लोड होने की स्थिति में दौड़ रहा इंजन दो से तीन लीटर प्रति किलोमीटर की दर से,भारी लोड और मालगाड़ी चार से छह लीटर डीजल एक किलोमीटर की यात्रा करने में खर्च करता है।तेज ढाल में छह से आठ लीटर प्रति किलोमीटर, पांच हजार टन भार वाली मालगाड़ी 500 किलोमीटर की दूरी तय करने में दो हजार से तीन हजार डीजल की खपत करती है।
इंजन की स्थिति को देखकर रेलवे ई-आक्शन के जरिए उसे बेच देता है।इंजन जिस स्थान पर खड़ा रहता है,वहां पहिया ट्राली को छोड़कर चयनित कंपनी को तीन माह के भीतर उसके हिस्से को काटकर ले जाना होता है।एक्सीडेंट वाले इंजन को रेलवे व्हील ट्राली के साथ ही नीलाम कर देता है। एक डीजल इंजन औसत 1.10 से 1.20 करोड़ रुपये और 18 प्रतिशत जीएसटी के साथ बोली में नीलाम किया जाता है।
कुल नौ बोलियां 15 मिनट में लगानी पड़ती है।बोली में शामिल होने के लिए कंपनी को रेलवे में पंजीकरण कराना जरूरी होता है।बोली लगाने से पहले 10 प्रतिशत धरोहर राशि जमा करना होता है। ई-नीलामी के बाद इंजन के तांबा,पीतल और लोहे को काटकर अलग कर लिया जाता है।
लोहा कानपुर की फैक्ट्रियों में भेज दिया जाता है,जहां उसे गलाकर बड़े-बड़े गर्डर तैयार होते हैं।वहीं पीतल और तांबा मुरादाबाद सहित अन्य शहरों में धातु का काम करने वाली फैक्ट्रियों को बेचा जाता है।इससे टीएमटी सरिया,स्टील प्लेट, औद्योगिक मशीनें,आटोमोबाइल पार्ट्स भी बनते हैं ।
डीजल इंजन का भार 110 से 120 टन होता है। रेलवे इंजन को स्क्रैप में बेचने से पहले उसके भीतर लगे इंजन ब्लाक, ट्रैक्शन मोटर,मुख्य अल्टरनेटर,एयर कंप्रेसर,टर्बोचार्जर , कंट्रोल कार्ड,रिले,बैटरियां,वाल्व और कैब उपकरण को निकाल लेता है।