नई दिल्ली।अमेरिका ने भारत समेत 60 देशों के सामान पर सेक्शन 301 के तहत नया टैरिफ लगा दिया है। भारत के लिए राहत की बात यह रही कि पहले 12.5 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाने की बात थी,लेकिन आखिर में इसे घटाकर 10 फीसदी कर दिया गया। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि भारत ने अपनी विदेश व्यापार नीति में बदलाव करते हुए जबरन मजदूरी से बने सामान के आयात पर रोक लगा दी,लेकिन असली सवाल सिर्फ 10 फीसदी टैरिफ का नहीं है। सवाल यह है कि क्या अमेरिका अब सेक्शन 301 का इस्तेमाल सिर्फ व्यापारिक नियम लागू करने के लिए कर रहा है, या फिर यह दूसरे देशों पर दबाव बनाने का नया तरीका बन चुका है
सिर्फ टैरिफ नहीं, दबाव बनाने का हथियार
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेन ट्रेड के वाइस चांसलर प्रोफेसर राकेश मोहन जोशी का कहना है कि सेक्शन 301 अब अमेरिका के सबसे ताकतवर व्यापारिक हथियारों में शामिल हो चुका है।प्रो जोशी के मुताबिक पहले इसका मकसद दूसरे देशों की कथित गलत व्यापारिक नीतियों के खिलाफ कार्रवाई करना था,लेकिन अब अमेरिका इसका इस्तेमाल सिर्फ टैरिफ लगाने के लिए नहीं, बल्कि दूसरे देशों की नीतियों को प्रभावित करने के लिए भी कर रहा है।भारत के मामले में भी अमेरिका पहले डिजिटल टैक्स, ई-कॉमर्स, बौद्धिक संपदा अधिकार, मेडिकल डिवाइस की कीमतों और कृषि बाजार जैसे कई मुद्दों पर सेक्शन 301 के जरिए दबाव बना चुका है। यानी भारत को इसे सिर्फ अतिरिक्त शुल्क नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दबाव के तौर पर भी देखना चाहिए।
जीटीआरआई को क्यों लगता है कि असली वजह कुछ और है
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव की रिपोर्ट के मुताबिक भारत पर लगाया गया 10 फीसदी अतिरिक्त शुल्क मजबूत तथ्यों पर आधारित नहीं दिखता।संस्था का कहना है कि अमेरिका ने ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं दिया कि भारत जबरन मजदूरी से बने सामान का आयात करता है,जबकि भारत पहले ही ऐसे सामान के आयात पर रोक लगा चुका है और भारतीय कानून भी फोर्स लेबर की इजाजत नहीं देते।जीटीआरआई का मानना है कि असली मकसद अस्थायी सेक्सन 122 टैरिफ खत्म होने के बाद भी अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था को जारी रखना है।
भारत के लिए अलग नियम क्यों
जीटीआरआई ने एक और बड़ा सवाल उठाया है। अमेरिका ने भारत और यूरोपीय संघ दोनों पर सेक्शन 301 के तहत 10 फीसदी कार्रवाई की है,लेकिन दोनों के साथ व्यवहार अलग है।भारत के ज्यादातर सामान पर पहले सामान्य MFN ड्यूटी लगेगी और उसके ऊपर पूरा 10 फीसदी सेक्शन 301 शुल्क जोड़ा जाएगा।वहीं यूरोप के सामान पर कुल शुल्क 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होगा।यानी अगर किसी सामान पर पहले से 6 फीसदी MFN ड्यूटी है, तो भारत के सामान पर कुल शुल्क 16 फीसदी होगा, जबकि यूरोप के उसी सामान पर सिर्फ 10 फीसदी।जीटीआरआई का कहना है कि जब कार्रवाई का आधार एक जैसा है तो नियम भी एक जैसे होने चाहिए। अलग-अलग देशों के लिए अलग तरीका अपनाना आगे चलकर कानूनी चुनौती बन सकता है।
भारत के टेक्सटाइल सेक्टर के लिए भी एक झटका
भारत के टेक्सटाइल सेक्टर के लिए भी एक झटका है। अमेरिका ने कुछ देशों को Textile and Apparel Tariff Rate Quota के तहत राहत दी है।बांग्लादेश,कंबोडिया, इंडोनेशिया और मलेशिया अगर अमेरिकी कपास या फाइबर से बने तय मात्रा के कपड़े और परिधान अमेरिका भेजते हैं, तो उन पर नया सेक्सन 301 शुल्क नहीं लगेगा,लेकिन भारत को यह छूट नहीं मिली है। यानी भारतीय टेक्सटाइल और गारमेंट निर्यातकों को वह फायदा नहीं मिलेगा, जो इन देशों को मिलेगा।
उत्पाद अमेरिका को निर्यात, वित्त वर्ष 2025-26 (मिलियन डॉलर) कुल अमेरिकी शुल्क
स्मार्टफोन 19,676.01 0%
दवाइयां 4,533.33 0%
पेट्रोलियम तेल और ईंधन 2,885.77 0%
कटे और पॉलिश किए गए हीरे 1,855.24 10%
जमे हुए झींगे और प्रॉन 1,525.39 10%
सोलर पीवी मॉड्यूल और पैनल 1,019.45 10%
हीरे जड़ी सोने की ज्वैलरी 931.34 15.5%
सादी सोने की ज्वैलरी 929.18 15.5%
मोटर वाहन के पुर्जे 815.38 27.5%
सूती तौलिए 651.26 19.1%
तैयार झींगे और प्रॉन 481.27 15%
सूती टी-शर्ट 455.54 26.5%
पावर सप्लाई, चार्जर और इन्वर्टर 427.58 10%
स्रोत: जीटीआरआई,अमेरिकी टैरिफ और DGCI&S के आंकड़ों पर आधारित
क्या अमेरिका खोज रहा लगातार नए तरीके
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि अमेरिका लगातार नए कानूनी रास्ते ढूंढ रहा है ताकि दूसरे देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए जा सकें।अजय के मुताबिक पहले अमेरिका के पास Reciprocal Tariff सबसे बड़ा हथियार था,लेकिन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उसे रद्द कर दिया। अब अमेरिका सेक्शन 301 जैसे दूसरे कानूनों का इस्तेमाल कर रहा है।अजय श्रीवास्तव ने कहा कि फिलहाल सेक्शन 301 के तहत दो जांच चल रही हैं और आगे भी नई जांच शुरू हो सकती हैं।उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका ने ब्राजील पर भी अलग कानूनी प्रावधान के तहत 25 फीसदी टैरिफ लगाया है। वहीं अमेरिकी सीनेट में ऐसा बिल भी आगे बढ़ रहा है, जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रस्ताव है।इससे साफ है कि अमेरिका अलग-अलग वजहों से नए टैरिफ लगाने का रास्ता तलाश रहा है।
क्या करना चाहिए भारत को
प्रो. जोशी का मानना है कि भारत को सिर्फ अमेरिका के फैसलों का इंतजार नहीं करना चाहिए।भारत को अपने निर्यात बाजार बढ़ाने होंगे।अफ्रीका,लैटिन अमेरिका,आसियान और पश्चिम एशिया जैसे नए बाजारों में ज्यादा ध्यान देना होगा ताकि किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता न रहे।इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स,डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर,स्किल डेवलपमेंट, गुणवत्ता और घरेलू प्रतिस्पर्धा पर निवेश बढ़ाना होगा। उनका कहना है कि भारत को प्रमुख देशों के साथ अच्छे Free Trade Agreements (FTA) भी तेजी से करने चाहिए, ताकि भारतीय कंपनियों को ज्यादा बाजार मिल सकें और भविष्य में ऐसे झटकों का असर कम हो।
भारत को अमेरिका के दबाव में आकर अपनी नीतियां नहीं बदलनी चाहिए
अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को अमेरिका के दबाव में आकर अपनी नीतियां नहीं बदलनी चाहिए। अगर अमेरिका रूस से तेल खरीदने पर सवाल उठाता है, तो भारत को सबसे पहले अपना राष्ट्रीय हित देखना चाहिए। अगर सस्ता तेल नहीं मिलेगा तो देश की ऊर्जा लागत बढ़ सकती है।भारत एक संप्रभु देश है और उसे अपने फैसले खुद लेने चाहिए। क्योंकि अमेरिका आज Forced Labour का मुद्दा उठा रहा है, तो कल किसी और वजह से नया टैरिफ लगा सकता है।
क्या भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से मामला खत्म हो जाएगा
प्रो. जोशी का कहना है कि अगर भारत और अमेरिका के बीच बड़ा व्यापार समझौता (BTA) हो जाता है, तो कुछ सेक्शन 301 कार्रवाई वापस ली जा सकती हैं,लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है।सेक्सन 301 अमेरिकी कानून है और व्यापार समझौते के बाद भी अमेरिका इसका इस्तेमाल कर सकता है।
अजय श्रीवास्तव भी यही कहते हैं कि सिर्फ FTA होने से कोई देश अमेरिकी कार्रवाई से नहीं बच जाता। यूरोपीय संघ जैसे देशों का उदाहरण सामने है।
WTO से कितनी मदद मिलेगी
इस मामले को WTO में ले जाने की बात भी हो रही है,लेकिन अजय श्रीवास्तव का कहना है कि फिलहाल WTO की विवाद निपटान व्यवस्था पहले जैसी मजबूत नहीं रही है, क्योंकि अमेरिका लंबे समय से उसकी अपीलीय व्यवस्था को प्रभावी तरीके से चलने नहीं दे रहा। ऐसे में WTO में मामला उठाने से संदेश तो जाएगा, लेकिन जल्दी राहत मिलने की उम्मीद कम है।
कुल मिलाकर पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ दिख रही है सेक्सन 301 अब सिर्फ व्यापारिक कानून नहीं रह गया
कुल मिलाकर पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ दिख रही है कि सेक्सन 301 अब सिर्फ व्यापारिक कानून नहीं रह गया है। अमेरिका इसका इस्तेमाल अपनी बड़ी व्यापारिक और रणनीतिक नीति के हिस्से के तौर पर कर रहा है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती सिर्फ 10 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ नहीं है। असली चुनौती यह है कि भविष्य में अमेरिका किस नए आधार पर फिर कोई नया शुल्क लगा दे। ऐसे हालात में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने, नए निर्यात बाजार तलाशने, अच्छे व्यापार समझौते करने और अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर लंबी अवधि की रणनीति बनाने पर ज्यादा जोर देना होगा।
क्या हैं सेक्शन 301 और 122
बता दें कि सेक्शन 301 अमेरिका के व्यापार कानून का एक प्रावधान है। अगर अमेरिका को लगता है कि कोई देश उसके साथ निष्पक्ष व्यापार नहीं कर रहा है या उसकी नीतियां अमेरिकी कंपनियों के खिलाफ हैं, तो वह इस कानून के तहत जांच शुरू कर सकता है। जांच के बाद उस देश के सामान पर अतिरिक्त टैरिफ या दूसरी व्यापारिक पाबंदियां लगाई जा सकती हैं।सेक्शन 122 भी अमेरिकी कानून का हिस्सा है, लेकिन इसका इस्तेमाल अस्थायी तौर पर आयात शुल्क लगाने के लिए किया जाता है। अमेरिका ने पहले इसी प्रावधान के तहत कई देशों पर 10 फीसदी अस्थायी टैरिफ लगाया था। अब वह अवधि खत्म हो गई है और उसकी जगह कई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर सेक्सन 301 के तहत नया शुल्क लगाया गया है। इसलिए अमेरिका अब अस्थायी टैरिफ की जगह लंबे समय तक असर रखने वाले प्रावधान का इस्तेमाल कर रहा है।