धनंजय सिंह।दस साल में पहली बार केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने चीनी आयात करने का निर्णय लिया है।अब डॉलर देकर सात समुंदर पार से चीनी आएगी,जबकि 2022 तक ईयू और यूएस को तय कोटा निर्यात के बाद यह प्रतिबंध लगाना पड़ता था कि अब और चीनी निर्यात न की जाए,जिससे घरेलू मांग की पूर्ति आसान बनी रहे और चीनी महंगी भी न हो।अब ये स्थिति निर्मित हो गई है कि घर-घर में इस्तेमाल होने वाली चीनी का भंडार पिछले साल की तुलना में 20 प्रतिशत कम हो गया है।इस कमी का प्रमुख कारण गन्ने का उपयोग एथनाल बनाने में किया जाना माना जा रहा है।भारत में पहले से ही अनाज से शराब बनाई जा रही है।खाद्य उपज से पेट्रोल और शराब का बड़ी मात्रा में निर्माण नीति-नियंताओं की अदूरदर्शिता प्रकट करती है।
बीते दो माह में चीनी की कीमत 40 प्रतिशत तक बढ़ गई। आगे रक्षाबंधन,गणेश महोत्सव और कृष्ण जन्माष्टमी जैसे बड़े त्योहार हैं,इसमें मिठाई और प्रसाद वितरण के लिए चीनी की बड़ी मांग रहती है।इसके तत्काल बाद नवदुर्गा,विजयदशमी और दीपावली जैसे बड़े पर्व हैं,इनमें चीनी की सबसे अधिक खपत होती है।अगर समय पर चीनी आयात नहीं हो पाती है तो चीनी के दाम आसमान तक पहुंच जाएंगे।हालांकि सरकार यह जता रही है कि पेट्रोल में एथनाल की मात्रा बढ़ाने से चीनी महंगी नहीं हुई है,बल्कि खराब मौसम से गन्ने की फसल की कम पैदावार से देश में चीनी का उत्पादन कम हुआ है। सरकार एक अन्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दामों में बढ़ोतरी बता रही है। सरकार ई-20 एथनाल पेट्रोल के उत्पादन पर अंकुश लगाने को तैयार नहीं है।यही कारण है कि सरकार ने ई-10 यानी 10 प्रतिशत एथनाल मिश्रित पेट्रोल बनाने के सुझावों को सिरे से खारिज कर दिया है।
देश में एथनाल उत्पादन की क्षमता तेजी से बढ़कर 2000 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष से ज्यादा हो गई है,जबकि पेट्रोल वाहनों में एथनाल मिला पेट्रोल उपयोग करने से वाहन का माइलेज प्रभावित हो रहा है। इसके बावजूद एथनाल निर्माण के नए संयंत्रों का निर्माण हो रहा है।इस सेक्टर को बैंकों ने एक लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया हुआ है।अब सरकार की दुविधा यह है कि यदि पेट्रोल में ब्लेंडिंग घटाई गई तो हजारों करोड़ के बैंक ऋण और देसी-विदेशी निवेश डूबने का संकट बढ़ जाएगा।ब्लेंडिंग वो प्रक्रिया है,जिसके तहत एक तय मात्रा में बायो फ्यूल यानी ई-20 या ई-10 प्रतिशत पेट्रोल में एथनाल मिलाया जाता है।हालांकि यह जीवाश्म ईंधन जलवायु परिवर्तन पर अंकुश लगाने के लिए पर्यावरण के अनुकूल है। इस कारण तमाम देश जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाने में लगे हैं।
केअर एज रेटिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक चालू वित्त वर्ष के अंत तक एथनाल उत्पादन क्षमता 400 करोड़ लीटर और बढ़ जाएगी।कुल उत्पादन क्षमता लगभग 2,400 करोड़ लीटर तक पहुंच जाने की संभावना है,जबकि 2014 में एथनाल का उत्पादन 421 करोड़ लीटर प्रतिवर्ष होता था, जो अब चार गुना अधिक हो गया है। चालू वित्त वर्ष के दौरान पेट्रोल ब्लेंडिंग के लिए ई-20 पेट्रोल के लिए 1,200 करोड़ लीटर एथनाल की जरूरत पड़ेगी।यही नहीं उद्योगों,फार्मा कंपनियों और रसायन क्षेत्रों में भी 350 लीटर एथनाल की मांग बनी हुई है। 2025 से देश में ई-20 पेट्रोल की बिक्री हो रही है।
लगता है पिछले कुछ समय से अमेरिका-ईरान,रूस-यूक्रेन और इजरायल के युद्धों के चलते केंद्र सरकार ने एथनाल मिश्रित पेट्रोल को और बढ़ावा देने का मन बनाया है।इधर एथनाल के नए संयंत्र लगाए जाने के कारण उद्योग जगत की मांग है कि ई-30 या उससे अधिक एथनाल मिश्रित पेट्रोल की बिक्री देशभर में शुरू की जाए।फिलहाल देश में गन्ना,मक्का और अन्य अनाजों से बने एथनाल के निर्यात पर प्रतिबंध लगाया जाए,क्योंकि यदि खाद्य सामग्री से बना एथनाल निर्यात होने लगा तो देश में अनाज की आपूर्ति में कमी तो आएगी ही, अनाज महंगा भी हो जाएगा।हालांकि वर्तमान में कृषि अवशेष और बायोमास से निर्मित एथनाल के निर्यात की अनुमति सितंबर 2025 से दे दी गई है,किंतु उद्योग जगत मांग कर रहा है कि सरकार नेपाल और इंडोनेशिया जैसे देशों में निर्यात की संभावनाएं तलाशे।
अनाज,फल-सब्जी जैसी वस्तुएं आदमी के जिंदा रहने की बुनियादी शर्त हैं, लेकिन आधुनिक जीवनशैली के लिए जरूरी बना दिए गए औद्योगिक उत्पादन और भौतिक उपकरणों को ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए वैकल्पिक स्रोतों में फसलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल दुनिया भर में हो रहा है। खाद्य संकट बनाए रखने के कारणों में यह एक प्रमुख कारण है। यदि जैविक ईंधन के लिए अनाज के प्रयोग को खुली छूट दे दी जाती है तो भारत में भूख का संकट गहरा सकता है। ऐसे में वाहनों के उत्पादन को बढ़ाना और बैंकों के कर्ज के जरिये उनकी बिक्री आसान करना भूख की स्थिति को और गंभीर बनाएगी। इस सिलसिले में ब्रिटेन की स्वयंसेवी संस्था आक्सफेम ने दुनिया में बढ़ रहे खाद्यान्न संकट के सिलसिले में चेतावनी दी है कि यदि अनाज से शराब और एथनाल बनाना बंद नहीं किया तो 2030 तक खाद्यान्न की मांग 70 प्रतिशत तक बढ़ सकती है और अनाज की कीमतें भी दोगुनी हो सकती हैं। ऐसे में एथनाल नीति पर फिर से विचार होना चाहिए।