नई दिल्ली।भारत का स्पेस सेक्टर अब सिर्फ इसरो के चंद्रयान,मंगलयान या गगनयान जैसे बड़े मिशनों की कहानी नहीं रह गया है।प्राइवेट कंपनियां भी रॉकेट बनाने,सैटेलाइट लॉन्च करने,धरती की तस्वीरों से डेटा जुटाने और स्पेस में मौजूद मलबे पर नजर रखने जैसे कारोबार में उतर रही हैं। यही वजह है कि आने वाले कुछ साल में भारत की स्पेस इकॉनमी तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।
ब्रोकरेज फर्म जेफरीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की स्पेस इकॉनमी 2023 में लगभग 8.4 अरब डॉलर थी। सरकार इसे 2030 तक लगभग पांच गुना बढ़ाकर 40 से 45 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखती है।रुपये में यह रकम मोटे तौर पर 3.5 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठती है। इतना ही नहीं, 2040 तक इसे 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
1 से बढ़कर 400 के पार पहुंचे स्पेस स्टार्टअप
भारत के स्पेस सेक्टर में सबसे बड़ा बदलाव प्राइवेट कंपनियों की एंट्री से आया है। 2014 में देश में इस सेक्टर में सिर्फ एक स्टार्टअप था,जबकि 2026 में इनकी संख्या बढ़कर 400 से ज्यादा हो चुकी है।ये कंपनियां रॉकेट,सैटेलाइट,अर्थ ऑब्जर्वेशन,रॉकेट इंजन और स्पेस से मिलने वाले डेटा जैसे अलग-अलग कारोबार में काम कर रही हैं।वित्त वर्ष 2026 तक भारतीय स्पेस स्टार्टअप में प्राइवेट निवेश लगभग 60 करोड़ डॉलर पहुंच चुका है।सरकार ने भी 1,000 करोड़ रुपये का वेंचर कैपिटल फंड,500 करोड़ रुपये का टेक्नोलॉजी एडॉप्शन फंड और दूसरे कार्यक्रम शुरू किए हैं।
अब सिर्फ प्रयोग नहीं,कारोबार भी शुरू
जेफरीज का कहना है कि भारतीय स्पेस स्टार्टअप अब शुरुआती प्रयोग के दौर से निकलकर कारोबार करने की तरफ बढ़ रहे हैं।स्काईरूट एयरोस्पेस ने जुलाई 2026 में विक्रम-1 के जरिए स्पेस में पेलोड पहुंचाया।कंपनी अब तक करीब 16 करोड़ डॉलर की रकम जुटा चुकी है। पिक्सेल धरती की हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीर और डेटा देने वाले सैटेलाइट चला रही है और उसे नासा से भी काम मिला है।अग्निकुल कॉसमॉस ने एक ही हिस्से में बना थ्री-डी प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन तैयार किया है। वहीं दिगंतरा स्पेस में मौजूद सैटेलाइट और मलबे पर नजर रखने के कारोबार में है। कंपनी स्पेस आधारित मिसाइल रक्षा तकनीक पर भी काम बढ़ा रही है।
इसके अलावा बेलाट्रिक्स स्पेस में सैटेलाइट की आवाजाही से जुड़ी तकनीक, सैटश्योर डेटा और एनालिटिक्स, ध्रुव स्पेस सैटेलाइट और ग्राउंड स्टेशन तथा इथीरियलएक्स दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले रॉकेट पर काम कर रही हैं।
अचानक क्यों बढ़ रहा है प्राइवेट कंपनियों के लिए मौका
लगभग छह दशक तक भारत का स्पेस सेक्टर मुख्य रूप से सरकार और इसरो के आसपास रहा,लेकिन 2020 में सरकार ने प्राइवेट कंपनियों के लिए पूरा स्पेस कारोबार खोलना शुरू किया।इसके बाद भारतीय स्पेस नीति 2023 लाई गई। इन-स्पेस को प्राइवेट कंपनियों के लिए मंजूरी और मदद देने वाली एजेंसी की भूमिका दी गई,जबकि एनएसआईएल इसरो की तकनीक और सेवाओं को कारोबारी स्तर पर आगे बढ़ा रही है। एनएसआईएल अब तक इसरो की तकनीक के 70 से ज्यादा ट्रांसफर समझौते कर चुकी है।विदेशी निवेश के नियम भी आसान किए गए हैं। सैटेलाइट बनाने और चलाने से जुड़े कुछ सेक्टरों में ऑटोमैटिक रास्ते से 74 फीसदी तक विदेशी निवेश की अनुमति है। लॉन्च व्हीकल और स्पेसपोर्ट में यह सीमा 49 फीसदी है, जबकि सैटेलाइट के पुर्जों और दूसरे हिस्सों के निर्माण में 100 फीसदी तक विदेशी निवेश ऑटोमैटिक रास्ते से किया जा सकता है।
निवेशकों के लिए कहां बन सकता है मौका
स्पेस सेक्टर की तेजी ने निवेशकों की दिलचस्पी भी बढ़ाई है। हालांकि स्काईरूट,पिक्सेल,अग्निकुल,दिगंतरा,बेलाट्रिक्स और ध्रुव स्पेस जैसी कई चर्चित कंपनियां अभी शेयर बाजार में लिस्टेड नहीं हैं।ऐसे में निवेशकों की नजर उन लिस्टेड कंपनियों पर रह सकती है,जिनका कारोबार सैटेलाइट,रॉकेट, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम,स्पेस के लिए जरूरी पुर्जों या इसरो और एनएसआईएल से मिलने वाले ऑर्डर से जुड़ा है,लेकिन यहां सिर्फ स्पेस सेक्टर से जुड़ा नाम होना काफी नहीं है। निवेशकों के लिए यह देखना जरूरी होगा कि कंपनी की कुल कमाई में स्पेस कारोबार की हिस्सेदारी कितनी है, उसे कितने ऑर्डर मिल रहे हैं और आने वाले समय में यह कारोबार उसकी कमाई को कितना बढ़ा सकता है।जेफरीज की इस रिपोर्ट में स्पेस सेक्टर के किसी लिस्टेड भारतीय शेयर पर अलग से खरीदारी की राय या टारगेट नहीं दिया गया है। रिपोर्ट का जोर फिलहाल इस बात पर है कि निजी कंपनियों की एंट्री और बढ़ते निवेश से भारत में स्पेस कारोबार का दायरा तेजी से बढ़ रहा है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत कम लागत
भारत के लिए एक बड़ी बढ़त कम लागत में स्पेस मिशन पूरा करने की क्षमता भी है।जेफरीज के मुताबिक वित्त वर्ष 2026 में भारत का स्पेस बजट करीब 1.4 अरब डॉलर था। इसके मुकाबले नासा का बजट करीब 25 अरब डॉलर था।रिपोर्ट के मुताबिक मंगलयान की अनुमानित लागत करीब 7.4 करोड़ डॉलर थी, जबकि नासा के मावेन मिशन की जीवनकाल लागत 67.1 करोड़ डॉलर से ज्यादा बताई गई है। हालांकि जेफरीज ने साफ किया है कि दोनों मिशनों के लक्ष्य और तकनीकी जरूरतें अलग होने की वजह से इनकी लागत की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।भारत ने 2014 से 2026 के बीच वैश्विक ग्राहकों के करीब 400 सैटेलाइट स्पेस में पहुंचाए हैं। यही कम लागत और तकनीकी क्षमता अब प्राइवेट कंपनियों के लिए भी कारोबार का रास्ता खोल सकती है।
निवेशकों के लिए क्या है असली बात
भारत की स्पेस इकॉनमी का पांच गुना बढ़ना बड़ा मौका जरूर दिखाता है,लेकिन फिलहाल इस कहानी का बड़ा हिस्सा स्टार्टअप और प्राइवेट कंपनियों में है।ऐसे में निवेशकों को केवल नाम में स्पेस या डिफेंस देखकर शेयर नहीं चुनना चाहिए।आने वाले सालों में असली नजर इस बात पर रहेगी कि कौन सी कंपनियां रॉकेट लॉन्च, सैटेलाइट बनाने, स्पेस से मिलने वाले डेटा, ग्राउंड स्टेशन और स्पेस के लिए जरूरी पुर्जों से टिकाऊ कमाई खड़ी करती हैं। जो कंपनियां प्रयोग से आगे बढ़कर लगातार ऑर्डर और कमाई दिखा पाएंगी, वही भारत की बढ़ती स्पेस इकॉनमी की असली कारोबारी विजेता बन सकती हैं।